माटी के रंग छत्तीसगढ़ का विचार मंच

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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

*छत्तीसगढ़िया कहां गंवागे*

कभू-कभू मोर मन मं,
           ये खियाल आवत हे।
इडली-दोसा ह संगी,
          सबो झन ल मिठावत हे।
चिला-फरा ह काबर,
           कोनो ल नइ भावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
           छत्तीसगढ़ मं नदावत हे।

दूसर के रंग मं संगी,
            खुद ल रंगावत हे।
बासी-चटनी बोजइया,
            पुलाव ल पकावत हे।
पताल के झोझो नदागे,
           मटर-पनीर सुहावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
           छत्तीसगढ़ मं नदावत हे।

अंगाकर के पूछइया,
               पिज्जा हट जावत हे।
बोबरा-चौसेला छोर के,
         सांभर-बड़ा सोरियावत हे।
भुलागे खीर बनाय बर,
        लइका ल मैगी खवावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
          छत्तीसगढ़ मं नदावत हे।

तिहार मं नइये संगी,
            ठेठरी-खुरमी खवइया।
आजकल के बहू भइया,
          नवा-नवा रोटी बनइया।
अइरसा-पोपची भुला के,
      नमकीन-गुजिया बनावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
         छत्तीसगढ़ मं नदावत हे।

अपन भाषा,अपन बोली,
          बचावव नारा लगावत हे।
जेने ह नरियावत हे,
                 तेने ह मिटावत हे।
छोर के हमर भाषा,
           अंग्रेजी मं गोठियावत हे।
छत्तीसगढ़ी भाषा ह,
          छत्तीसगढ़ मं नदावत हे।

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

शुरुआत



शुरुआत कैसे होगी यह बात आदमी के मन में इस कदर घर कर लेता है की वो शुरुआत करने से पहले ही अपना मन निराश कर बैठता है उन निराश होने वाले लोगो को  ये कहूँगा की नर हो ना निराश करो मन को आप लोगो ने ये पाठ तो बच्चो के मुह से सुना ही होगा ना रो ना निराश करो मन को ……………अब ये बात मेरे दिमाग में जैसे ही आई ये क्या मुझे तो एक नई शुरुवात मिल चुकी है मुझे रास्ता दिखाई देने लगा है क्योकि मुझे इस पाठ से जुदा हुआ एक किस्सा याद आया है जिसे मै आप सब के साथ बाटना चाहूँगा ………


यह बात लगभग 11 से 12 वर्ष पुरानी है

                 हुआ कुछ यु की मेरे परम मित्र कमलेश सिंह गंगवाल की एक बुक डिपो की दुकान थी जहाँ पर हम लोग गप्पे लगाते हुए बैठे हुए थे इतने में दो छोटे

छोटे  बच्चे  दुकान में आकर कमलेश से बोलता है भैया कलम देना कमलेश बोला कलम तो …………नई हे भाई ……………..बच्चो के चेहरे का भाव बदल गया वो दोनों मुह उतारकर जाने के लिए मुड़े मैंने देखा बच्चे नीरस हो गए है उनका उतरा मन देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा सो मैंने उनसे पूछा तुमन कोन कक्षा मा पढतो जी वो रोनी सूरत बनाकर बोले दूसरी ये देखकर मुकेश नाम का एक लड़का बोला नर हो ना निराश करो मन को

 अब ये पाठ तो मैंने ना पढ़ा था ना सुना था  मुझे हो गयी थोड़ी सी गलतफहमी मैंने वो लाइन को इस तरह समझा  ना रो ना निराश करो मन को मुझे ऐसा इसलिए लगा क्योकि बच्चे दुखी थे तो उनको सांतावना देने के लिए जो भाव मेरे मन में था उससे यही प्रतीत हुआ की न रो न निराश करो मन को पर मेरे मित्र कमलेश की समझ देखिये उसने ये कहा नरवो ना निराश करो मन को अब हम दोनों में बहस छिड़ी की वो लाइन क्या थी उसका अर्थ क्या था और बच्चो की वस्तुस्तिथि को देखते हुए उस लाइन को क्या होना था ये एक पहेली बन गयी क्योकि उस जगह पर तीनो लाइन सही बैठती थी आप के हिसाब से  क्या होना चाहिए 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

पुरखा के खेत अउ पुरखा के बारी

पुरखा के खेत के लिए चित्र परिणाम

पुरखा के खेत अउ पुरखा के बारी
बेंचें के नोहे राखेच भर के हे पारी

मइनखे कथे मोर खेत मोर बारी
अरे तोर नोहे  बबा...
एहा हरे हमर पुरखा के उधारी
 हमर काम तो करना हे रखवारी
 आज मोर ता काली तोर पारी

इही माटी मा कतको मालिक पच गेहे
तब ले ए खेत अउ बारी हा आज ले बच गेहे

करम के बाढी अउ करम के उधारी
छूटे के बेर तोला पड़हि भारी
बने बने करम कर
तहन काबर भटकबे
एकर दुवारी वोकर दुवारी।

जीतेन्द्र कुमार साहू


गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मैं


उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है. २
मैं  में सिर्फ मैं  हू
ना कोई बहन ना भाई है
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

मैं  की कहानी ऐसी है
उबलते पानी जैसी है मैं
कड़कते धूप जैसी है मैं
दहकते आग जैसी है मैं
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

काजल से भी काली है मैं
पाप से भी भारी है मैं
भ्रष्टाचार की कहानी  है मैं
अफसरों का राजदुलारी है मैं
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

शैतानों के लिए इक शान है मैं
नेताओं के लिए इक अधिकार  है मैं
किसानो के लिए इक मेहमान है मैं
इंसानियत के लिए इक अभिमान है मैं
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

मैं  की सृष्टी में मै ही भगवान है
मैं  के शासन में मै ही सरकार है
मैं ही साक्षी है
और मैं ही साकार है
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

कौन बच सका है इस मैं  से
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है
उखाड़ फेको इस मैं  को
इस मैं  में बहुत बुराई है इस मैं  में बहुत बुराई है

हमर देश के खजाना चुनाव मा लुटागे


जम्मो   बूता  हा  चुनाव  माँ   बोहागे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

विधानसभा के चुनाव आगे चुनाव आगे
चुनाव आगे कहिके नेता मन हा भागत आगे
कहत हाबे चुनाव आगे    चुनाव आगे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

कोनो भाजपा माँ ता कोनो कांग्रेस माँ
ता कोनो स्वाभिमान मंच माँ भुलागे
कतको झन तो अपन  पार्टी ला भुलागे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

इकर रंग रंग के घोषणा माँ दिन हा बूड़त हे
बबा हा नी  मरे हे तब ले बरा हा चूरत हे
इहाँ उहाँ के दौरा में नेता हा सुखागे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

कोनो मिठाई कोनो दारु ता कोनो पईसा बाटत हे
चुनाव आगे कहिके गली गली कईसे झाँकत हे
चुनाव जीतगे तहन नेता हा जनता ला भुलागे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

कोनो पिये मा ता कोनो खाये मा भुलागे
जनता हा अपन अधिकार ला भुलागे
हमर देश के खजाना चुनाव मा लुटागे
लइका सियान सबो चुनाव माँ भुलागे

रचनाकार - जितेन्द्र कुमार साहू

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

मन की तरंग बिन डोर पतंग


मेरे मन में बसी एक अदनी सी काया
जो मैं चाह कर भी
साफ साफ देख नही पाया
क्योकि
मुझे डर है कि
ये सूरत कही गुम ना हो जाए
एक धुंधली सी रोशनी में वो चमकती सी आभा
और वो हल्की सी चेहरे पे खुशीयो का साया
गोरे बदन पर ये जुल्फों का साया
चाहकर भी मैं खुद को रोक ना पाया
ये हसीन सपने और वो सुंदर सी काया
रेशम के कपडो से सजी है माया
माया के छल ने फिर मुझे भरमाया
सपनो की दुनिया में हकीकत का छाया
अब आंख खुली तो यकी ना आया
मैंने खुद को अकेला पाया

माटी के मितान


माटी के मितान
धन धन मोर माटी के मितान ,
कहिथे तोला गवईहा किसान ।
खांद मा नांगर ,मुड़ मा खुमरी ,
हाथ मा धरे तुतारी।
किसम किसम के बिजहा बोवय तै ,
खेत खार अऊ बारी ,
कहिथे तोला भुय्या के भगवान ,
धन धन मोर माटी के मितान ,
कहिथे तोला गवईहा किसान ।
कहिथे किसनहा झन काटव रुखुवा ,
इहि धरती के गहना ऐ ,
लकलकावत भोमरा ले दुरिहा ,
इकरे छांव मा रहना हे ,
झन करव भईया ,
भुय्या के अपमान ,
धन धन मोर माटी के मितान ,
कहिथे तोला गवईहा किसान ।
रचनाकार -सूरजभान
सहयोग - जितेन्द्र कुमार